माँ, याद तुम्हारी आती है।

on सोमवार, 17 दिसंबर 2012

इस कमरे का एकाकीपन 
तन्हा है ये मेरा मन 
इस अंधियारे में तेरी याद 
यादों के दीप जलाती है,
माँ, याद तुम्हारी आती है।

पास के छत पर माँ कोई 
गोद के मुन्ने में खोई,
कोमल थपकी दे-देकर 
जब लोरी कोई सुनाती है,
माँ, याद तुम्हारी आती है।

जब गर्म तवा छू जाता है 
हाथ मेरा जल जाता है 
या तेज धार की छूरी से 
ऊंगली ही कट जाते है,
माँ, याद तुम्हारी आती है।

हाँ, तुमसे मेरी दूरी है 
कुछ ऐसी ही मजबूरी है 
देर रात तक बिस्तर पर 
जब नींद मुझे न आती है,
माँ, याद तुम्हारी आती है।

कुछ बड़े सही मेरे अरमाँ 
पर बुरा नहीं मैं, मेरी माँ 
क्यूँ बार-बार तू रो-रोकर 
दिल के टूकड़े कर जाते है,
माँ, याद तुम्हारी आती है।

जब मुखड़ा तेरा हँसता है 
मुझे कितना अच्छा लगता  है 
इक दिन तुम्हें हँसाउंगा 
आवाज़ ये दिल से आती है, 
माँ, याद तुम्हारी आती है।

-- राहुल कुमार
(सर्जना 27वें अंक से)

नियति

on रविवार, 20 फ़रवरी 2011

उठा-उठा लाता हूँ
लकड़ी का टुकड़ा
फेंक दिया था तुम ने जिसे
घर के पिछवाड़े

खींचता हूँ उस पर लकीरें
कुछ आड़ी, कुछ तिरछी
उसी कलम से
जिस की नीब से
कभी कम कभी ज्यादा
रोशनाई निकल जाया करती थी
और नाक-भौं सिकोड़ा करते थे तुम;
वे ही लकीरें
अक्स दर्शातीं रहीं तुम्हारे

एक अनदेखा अनजिया क्षण
गुजर गया करीब से तुम्हारे
जब सपने रीतते रहे
उस क्षण में भर दी मैं ने
तुम्हारी खामोशी
खुशी को तलाशती तुम्हारी व्याकुलता
कोई कारण नहीं
उस क्षण की चादर तान
कई ठिठुरती रातें उष्मा-आभा पाती रहीं।

-- सत्यन कुमार
सर्जना-२००२
ऊर्ध्व (विसंवाद पंचम की स्मारिका से)

कुछ ऐसा हुआ होगा

on गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

जब उसने जाना कि
झाड़ियों  के पीछे
अपनी-अपनी हड्डी चबाते
गोल-गोल घूम
अपनी पूँछ का पीछा करना ही ज़िन्दगी है
मेरी, तुम्हारी नजर में तब............
एक दुःख उसे साल गया |

दुःख  कुछ ऐसा
जिसका  साझा बनाना आसान नहीं होता
क्योंकि एक सिरफिरे को समझने के लिए समझ का न होना जरुरी है |
कुछ ऐसा दुःख
जो जीने को लेकर है
जो जीने से उपजे तजर्बों से है
जो हर उस चीज़ से है
जो उसे उस के सपनों  से अलग रहने  की नसीहत की याद दिलाते हैं |

सपने . . .
जिसे उस  ढंग  से अब शायद ही कोई देखता है
सपने जो मासूम शिशु -से कोमल होते हैं
और ऐसे में
सपनों को सहेजना उतना ही मुश्किल है
जैसे नवजात शिशु को  |

- विद्यापति मिश्र

(राहुल के लिए )

......पुनरपि ( विसंवाद - चतुर्थ कि स्मारिका ) में प्रकाशित .........

मेरा मैं

on शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009


मेरा मैं
है कहीं भीतर
खूब भीतर’
और परतें चढी जा रही हैं
चढ़ती जा रही हैं
परतें...
परतें...
परतें...
दो बूँद खामोशी
सहेज रखी है मैंने
किसी बेशकीमती विरासत की तरह
जब आँखों को मूँदकर
छूता हूँ अपनी खामोशियों को
तो लगता है
कुछ मिल गया है खोया-सा
और परतों के भीतर
खूब भीतर
कुछ कहता है कुछ सुनता है
कहीं ज़िन्दा है
कहीं ज़िन्दा है
मेरा "मैं"।

-- राहुल कुमार
(सर्जना २८वें अंक से)

बोलते अक्षर

on शुक्रवार, 10 जुलाई 2009


अक्षर,
जो क्षय नहीं होते
मानव की भांति नहीं रोते
अंकित हो जाते हैं हृदय पर
पुकारते हैं अपनी आवाज़ से
हाँ, अक्षर भी बोलते हैं
तुमने सुनी नहीं अब तक
शायद तुम पढ़ते-लिखते
रहे हो अक्षरों को,
जानते नहीं सच
बोलने वाले अक्षर
नए नहीं हैं
सदियों से वे सुना रहे हैं
दास्तान अपनी

शब्दों से भी बड़े हैं,
ये अक्षर जो जोड़ते हैं
कभी-कभी ज़िन्दगी भी
साक्षर होने का मतलब ये
नहीं कि तुम सुन पाओगे
अक्षरों की ध्वनि से परिचित हो
गाथाओं को बुन पाओगे,
क्योंकि तुम तो क्षणिक हो
अविनाशी एवं निरन्तर जो हैं,
वे क्षणभंगुर नहीं होते,
अक्षर,
जो क्षय नहीं होते।

-- दीपक कुमार


(सर्जना २५वें अंक से)